Thursday, April 7, 2011

भीतरी प्रेरणा से मिलती है कामयाबी

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि ऎसा कोई नियम नहीं है जो आपको सफलता की ओर ले जा सकता हो। सफलता विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत मामलों पर निर्भर करती है और हरेक के लिए उपलब्धि के अलग मायने होते हैं।
यहां तक कि यह जरूरी नहीं कि कोई अपनी आवश्यकताओं की पूरी तरह से पूर्ति कर लेता हो तो वह सफल ही कहलाएगा। सफलता व्यक्ति को भीतरी प्रेरणा से मिलती है और सबके लिए अलग-अलग होती है। पिकासो की पेंटिंग को अद्भुत माना जाता है और कहा जाता है कि दस कलाकार एक साथ मिलकर भी इस तरह की पेंटिंग बनाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे। हर क्षेत्र में कुछ सफल पुरूष होते हैं और सबकी अपनी अलग तरह की रचनाशीलता होती है। चाहे वह दियासलाई हो या फिर डाइनामाइट, हर एक ने कुछ न कुछ योगदान दिया है। तभी उन्हें सफल व्यक्तियों की श्रेणी में रखा गया है।
किसी एक क्षेत्र में सफल व्यक्ति की तुलना दूसरे क्षेत्र के कामयाब व्यक्ति से नहीं की जा सकती। व्यक्ति खुद एक सपना देखता है जिसे साकार करने के लिए वह पुरजोर कोशिश करता है और सही दिशा में किया गया उसका प्रयास ही उसे कामयाबी की ओर ले जाता है। ज्यादातर कामयाब पुरूष प्रतिभावान होते हैं और उनमें कुछ ऎसे भी होते हैं जिन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा भी हासिल नहीं की होती, जिसे सफलता की पहली सीढ़ी माना जाता है। औपचारिक शिक्षा का कामयाबी से कोई लेना-देना नहीं होता है। किसी चीज के आविष्कार के लिए औपचारिक शिक्षा का होना जरूरी माना जाता है, लेकिन कामयाब व्यक्ति बनने के लिए बहुत सारे गुणों का होना जरूरी है। अगर आप महान व्यक्तियों की जीवनी का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वे कोई बहुत ज्यादा प्रतिभाशाली नहीं थे, बल्कि बहुत ही ज्यादा सुव्यवस्थित तरीके से काम निबटाते थे।
कामयाबी के लिए प्रतिभावान होने से ज्यादा जरूरी है चीजों को चतुराई से निबटाना। प्रतिभा अलग चीज है पर कार्यकुशलता ही सबकुछ है। इससे हर बाधा से निकलकर आगे बढ़ने की चतुराई आती है और बाधाओं को खत्म भी किया जाता है। कामयाबी की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए समय के मुताबिक बदल जाती है। एक बात तो तय है कि कामयाब लोग भौतिक रूप से हमेशा और आपकी तरह ही होते हैं, बस अंतर सिर्फ सोचने की प्रक्रिया में ही होता है। एक कामयाब व्यक्ति पहले किसी चीज का सपना देखता है। फिर अपनी क्षमताओं को पहचान कर उसका मूल्यांकन करता है और अपने लक्ष्य की प्राçप्त में जुट जाता है और तब तक जुटा रहता है, जब तक उसे लक्ष्य प्राप्त नहीं होता।
एक असफल इंसान भी यही रास्ता शुरूआत में चुनता है, लेकिन राह में मुसीबतें आने पर वह तय रास्ते को बदल देता है और दूसरी राह पर चलने लगता है। जब बार-बार मुश्किलें सामने आती हैं तो वह सुस्ताने लगता है और फिर आगे बढ़ना बंद कर देता है। वे ऎसा मानने लगता है कि जो लक्ष्य उसने बना रखा था वे उसके काबिल नहीं हैं और वह उसे नहीं पा सकता। भाग्यशाली लोग ही लक्ष्य तक पहुंच पाते हैं, मेरे भाग्य में यह सुख नहीं। ऎसा सोचने वाले कभी विजेता नहीं बन सकते। भारत की महान और धनी विरासत के बारे में सुनकर इतिहास में सिकंदर से पहले कई महान योद्धाओं ने भारत पर आक्रमण किया था, लेकिन उनमें से कोई सफल नहीं हो पाया था। सिकंदर ने सारी परिस्थितियों का पहले अच्छी तरह से आकलन किया, उसका पूरी तरह से अध्ययन किया, अपने सेनापति और समर्पित सैनिकों से विचार-विमर्श करने के बाद पूरी कार्ययोजना तैयार की और उसी के अनुसार आक्रमण किया। आपको सिकंदर के बारे में एक रोचक किस्सा सुनाता हूं, जिसे जानकर आप यह समझ जाएंगे कि आखिर सिकंदर को द ग्रेट क्यों कहा जाने लगा।
सिकंदर ने ई. पूर्व 326 में भारत पर आक्रमण किया था। भारत से काफी दूर स्थित मेसिडोनिया का शासक था वह। वह एक वास्तविक योद्धा था। उसने पेरिस को हराया, जो उस समय के महान भारतीय योद्धा थे। जीतने के बाद उसके सेनापति ने शासन की बागडोर संभालने के लिए सिकंदर को वहां बुलाया। युद्धभूमि से राजधानी तक जाने के लिए जोकि वहां से 50 किलोमीटर दूर स्थित थी, एक हाथी का इंतजाम किया गया था। सिकंदर हाथी पर बैठा और उसकी लगाम हाथ में देने को कहा। उसके सेनापति ने कहा कि हाथी की सवारी में लगाम नहीं होती।
हाथी पर एक अन्य व्यक्ति भी सवार है, जिसे "महावत" कहा जाता है और हाथी को यही चलाता है। यही उसे नियंत्रण में करता है। सुनकर सिकंदर को ब़डा आpर्य हुआ, वह हाथी पर से कूद गया और कहा, ""मैं ऎसी किसी भी चीज पर सवार नहीं होना चाहता, जिसका नियंत्रण मेरे हाथ में न हो। उसने अपने सेनापति से घो़डे का इंतजाम करने को कहा ताकि वह राजधानी तक पहुंच सके।"" सिकंदर की यह दृढ़ इच्छाशक्ति ही थी जो उसके आकलन के मुताबिक परिणाम देती थी। बहुतों को इतिहास बतौर विषय पसंद नहीं है लेकिन इसकी कहानियां काफी शिक्षाप्रद हैं, जो हमें किसी का मूल्यांकन करने के काम आती है। असंख्य लोग इस दुनिया में आते-जाते हैं, लेकिन किसी को कोई याद नहीं रख पाता।
परंतु कुछ ही निष्ठावान लोग ऎसे थे जिन्हें उनकी कामयाबी के लिए याद रखा गया है। ऎसे भी बहुत से लोग हैं जो गिनती से परे हैं। आजादी से पहले अपने निष्ठापूर्वक कार्य करने के चलते तीन ब़डे औद्योगिक घराने-टाटा, बिरला और डालमिया प्रसिद्ध थे। इन्होंने बिल्कुल नीचे से शुरूआत की थी और कम वक्त में दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत बहुत कुछ हासिल किया। (डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित पुस्तक "खुद बदलें अपनी किस्मत" से साभार)

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