इस जमाने में ख्याति अर्जित करने में वही सक्षम हुए हैं, जिन्होंने संकल्प लेकर बिना विचलित हुए, पूरी तत्परता से अपना कार्य किया है।
यात्रा पथ पर यह जरूरी नहीं कि आपको सदैव राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाईवे) ही मिले। आपको टूटी और गंदी स़डकें भी मिलेंगी, पर वहां ठहरना नहीं है। इन टूटी स़डकों पर चलने से आप और ज्यादा मजबूत बनेंगे। इन स़डकों पर चलने के दौरान आपकी लगनशीलता की जांच होती है। दृढ़ मानसिक शक्ति वाले व्यक्ति की तुलना में लगनशील व्यक्ति ज्यादा बेहतर होता है। एक तत्पर आदमी कभी भी बिना मूल्यांकन किए कोई कार्य शुरू नहीं करता है, लेकिन एक बार अगर वह शुरू कर देता है तो फिर किसी भी हालत में उसे पूरा करके ही छो़डता है।
तत्परता एक जन्मजात गुण है, लेकिन इसे अभ्यास से भी हासिल किया जा सकता है। हमारी शिक्षा पद्धति कुछ इस तरह की है कि उसमें हर चीज का शॉर्टकट सिखाया जाता है और यही जीवन में हमारी असफलता के कई कारणों में से एक कारण बनता है। हमारी शिक्षा पद्धति में कुछ ऎसी विकृतियां भरी हैं कि हम केवल अंक हासिल करने की ओर ही पूरा ध्यान केंद्रित रखते हैं। हम अपने छात्रों को यह क्यों नहीं पढ़ाते कि इस संसार में ऎसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है जिसे हम पा न सकेंक् हम क्यों नहीं उन्हें अपने कार्यो में तत्परता लाने की शिक्षा देते हैंक् एडिसन और न्यूटन तो कभी भी किसी सलाहकार के पास नहीं गए थे तो फिर कैसे उन्होंने बल्ब का आविष्कार कर लिया और गति के नियम का प्रतिपादन किया, जिसने आज हमारा जीवन कई मायनों में आसान बना दिया है।
तत्परता से कार्य करना ही सफलता की राह पर चलना है। बिना तत्परता के आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते भले ही परिस्थितियां शत-प्रतिशत ही आपके पक्ष में क्यों न हों। एक ही दिशा में सोच-विचारकर तत्परता से अग्रसर होने पर ही सफलता मिल पाती है। बिना तत्परता के आपको कुछ भी हासिल होने की संभावना कम ही रहती है। अगर आपने कुछ पा लिया तो समझिए कि वह आपकी तत्परता का ही परिणाम है और एक बार आपने कुछ पाया तो वह आपके लिए टॉनिक का काम कर सकता है। इस तरह की प्रेरणा का आधार तत्परता ही होती है। एक ट्रेनिंग सेशन के दौरान दिल्ली में मेरी मुलाकात एक 52 वर्षीय महिला शिक्षक से हुई। बिहार के सुदूर इलाके से आई उस महिला की शादी महज 15 साल की आयु में हो चुकी थी और रोजगार पाने के क्रम में वह अपने पति के साथ दिल्ली आई थी। 20 साल की उम्र में वह दो बेटियों की मां बन चुकी थी।
अचानक एक स़डक दुर्घटना में उसके पति की मृत्यु हो गई, लेकिन उसने अपनी हिम्मत बरकरार रखते हुए दोनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाई, ताकि वे देश की बेहतर नागरिक बन सकें। बेटियों के पढ़ते समय वह उनके साथ बैठती। उसने अपनी बेटियों के साथ ही पढ़ाई-लिखाई शुरू की और स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में उसने स्त्रातकोत्तर और फिर बैचलर ऑफ टीचिंग की डिग्री हासिल की। घर-गृहस्थी का सारा काम करने के दौरान ही उसने ऎसा किया। घर के पास ही एक प्राइमरी स्कूल में वह नौकरी करने लगी और सात वर्ष के भीतर दिल्ली के ही एक प्रतिष्ठित स्कूल में वाइस प्रिंसिपल बन गई। जब मैंने उससे पूछा कि आपने कैसे ये सब मुमकिन किया तो वह कहने लगी, ""मैं अपनी बेटियों को अपनी पूर्व की बिताई जिंदगी नहीं देना चाहती थी।"" उसने बताया कि पति की मौत के बाद उसने तय किया कि अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाएगी, चाहे इसके लिए कितनी ही मेहनत क्यों न करनी प़डे।
आज उसकी ब़डी बेटी आईएएस है और छोटी बेटी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट कर रही है। आप ऎसा मत सोचिए कि यह केवल अपवाद है, केवल अपवाद के सिद्धांत को साबित करता है। यह सिद्धांत यह बताता है कि अगर आपने कुछ करने की ठान ली तो फिर कोई भी ब़डी से ब़डी बाधा आपका कुछ नहीं बिग़ाड सकती है। केवल दिमाग से असफलता और निराशा वाले विचार निकाल कर बाहर फेंक दीजिए। असफलता की सोचेंगे तो वह आपको निराशा की ओर ले जाएगी और तब आपको कहीं सहयोग दिखाई नहीं देगा लेकिन आप सफलता की ओर देखेंगे तो चहुंओर से समर्थन मिलेगा। आप भी कुछ ठान सकते हैं और खुद अपनी एक कहानी लिख सकते हैं। इसमें कोई परेशानी नहीं है, बस जरूरत है तो अमल में लाने की। हमेशा यह याद रखना चाहिए कि जो वक्त गुजर गया वह कभी भी लौटकर नहीं आता है और एक बार आपको सफलता मिल गई तो आपके पास भी समय का अभाव होने लगेगा। इसलिए सोचिए मत और ज्यादा देर मत करिए। बस आप जो लंबे समय से सोच रहे हैं उसे ठान लीजिए कि इसे करना है।
अगर आप इसमें देरी करते हैं तो खुद आपको उसकी कीमत चुकानी होगी। जो जीतना चाहते हैं, वे देर नहीं लगाते। हार से घबराने की जरूरत भी नहीं है। ठहराव-सा आ सकता है। एक बार अगर आपने ठान लिया तो फिर कोई आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकता, असफलता भी नहीं। मोहम्मद गोरी को याद कीजिए, जिसे पृथ्वीराज चौहान ने 17 बार हराया, लेकिन अंतत: वह जीतने में कामयाब रहा। इस युद्ध में चौहान की हुई हार महज उनकी अपनी हार नहीं थी, बल्कि इस हार की वजह से भारत में सात सौ साल से भी ज्यादा समय तक मुस्लिम शासकों की सत्ता कायम रही।
इसी को कहते हैं मन में ठाने हुए को वास्तविकता में बदल देना जो न केवल आपके लिए, बल्कि आपके बाद आने वाली पीढ़ी के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है और आप उनके लिए नायक बन सकते हैं।
यात्रा पथ पर यह जरूरी नहीं कि आपको सदैव राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाईवे) ही मिले। आपको टूटी और गंदी स़डकें भी मिलेंगी, पर वहां ठहरना नहीं है। इन टूटी स़डकों पर चलने से आप और ज्यादा मजबूत बनेंगे। इन स़डकों पर चलने के दौरान आपकी लगनशीलता की जांच होती है। दृढ़ मानसिक शक्ति वाले व्यक्ति की तुलना में लगनशील व्यक्ति ज्यादा बेहतर होता है। एक तत्पर आदमी कभी भी बिना मूल्यांकन किए कोई कार्य शुरू नहीं करता है, लेकिन एक बार अगर वह शुरू कर देता है तो फिर किसी भी हालत में उसे पूरा करके ही छो़डता है।
तत्परता एक जन्मजात गुण है, लेकिन इसे अभ्यास से भी हासिल किया जा सकता है। हमारी शिक्षा पद्धति कुछ इस तरह की है कि उसमें हर चीज का शॉर्टकट सिखाया जाता है और यही जीवन में हमारी असफलता के कई कारणों में से एक कारण बनता है। हमारी शिक्षा पद्धति में कुछ ऎसी विकृतियां भरी हैं कि हम केवल अंक हासिल करने की ओर ही पूरा ध्यान केंद्रित रखते हैं। हम अपने छात्रों को यह क्यों नहीं पढ़ाते कि इस संसार में ऎसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है जिसे हम पा न सकेंक् हम क्यों नहीं उन्हें अपने कार्यो में तत्परता लाने की शिक्षा देते हैंक् एडिसन और न्यूटन तो कभी भी किसी सलाहकार के पास नहीं गए थे तो फिर कैसे उन्होंने बल्ब का आविष्कार कर लिया और गति के नियम का प्रतिपादन किया, जिसने आज हमारा जीवन कई मायनों में आसान बना दिया है।
तत्परता से कार्य करना ही सफलता की राह पर चलना है। बिना तत्परता के आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते भले ही परिस्थितियां शत-प्रतिशत ही आपके पक्ष में क्यों न हों। एक ही दिशा में सोच-विचारकर तत्परता से अग्रसर होने पर ही सफलता मिल पाती है। बिना तत्परता के आपको कुछ भी हासिल होने की संभावना कम ही रहती है। अगर आपने कुछ पा लिया तो समझिए कि वह आपकी तत्परता का ही परिणाम है और एक बार आपने कुछ पाया तो वह आपके लिए टॉनिक का काम कर सकता है। इस तरह की प्रेरणा का आधार तत्परता ही होती है। एक ट्रेनिंग सेशन के दौरान दिल्ली में मेरी मुलाकात एक 52 वर्षीय महिला शिक्षक से हुई। बिहार के सुदूर इलाके से आई उस महिला की शादी महज 15 साल की आयु में हो चुकी थी और रोजगार पाने के क्रम में वह अपने पति के साथ दिल्ली आई थी। 20 साल की उम्र में वह दो बेटियों की मां बन चुकी थी।
अचानक एक स़डक दुर्घटना में उसके पति की मृत्यु हो गई, लेकिन उसने अपनी हिम्मत बरकरार रखते हुए दोनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाई, ताकि वे देश की बेहतर नागरिक बन सकें। बेटियों के पढ़ते समय वह उनके साथ बैठती। उसने अपनी बेटियों के साथ ही पढ़ाई-लिखाई शुरू की और स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में उसने स्त्रातकोत्तर और फिर बैचलर ऑफ टीचिंग की डिग्री हासिल की। घर-गृहस्थी का सारा काम करने के दौरान ही उसने ऎसा किया। घर के पास ही एक प्राइमरी स्कूल में वह नौकरी करने लगी और सात वर्ष के भीतर दिल्ली के ही एक प्रतिष्ठित स्कूल में वाइस प्रिंसिपल बन गई। जब मैंने उससे पूछा कि आपने कैसे ये सब मुमकिन किया तो वह कहने लगी, ""मैं अपनी बेटियों को अपनी पूर्व की बिताई जिंदगी नहीं देना चाहती थी।"" उसने बताया कि पति की मौत के बाद उसने तय किया कि अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाएगी, चाहे इसके लिए कितनी ही मेहनत क्यों न करनी प़डे।
आज उसकी ब़डी बेटी आईएएस है और छोटी बेटी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट कर रही है। आप ऎसा मत सोचिए कि यह केवल अपवाद है, केवल अपवाद के सिद्धांत को साबित करता है। यह सिद्धांत यह बताता है कि अगर आपने कुछ करने की ठान ली तो फिर कोई भी ब़डी से ब़डी बाधा आपका कुछ नहीं बिग़ाड सकती है। केवल दिमाग से असफलता और निराशा वाले विचार निकाल कर बाहर फेंक दीजिए। असफलता की सोचेंगे तो वह आपको निराशा की ओर ले जाएगी और तब आपको कहीं सहयोग दिखाई नहीं देगा लेकिन आप सफलता की ओर देखेंगे तो चहुंओर से समर्थन मिलेगा। आप भी कुछ ठान सकते हैं और खुद अपनी एक कहानी लिख सकते हैं। इसमें कोई परेशानी नहीं है, बस जरूरत है तो अमल में लाने की। हमेशा यह याद रखना चाहिए कि जो वक्त गुजर गया वह कभी भी लौटकर नहीं आता है और एक बार आपको सफलता मिल गई तो आपके पास भी समय का अभाव होने लगेगा। इसलिए सोचिए मत और ज्यादा देर मत करिए। बस आप जो लंबे समय से सोच रहे हैं उसे ठान लीजिए कि इसे करना है।
अगर आप इसमें देरी करते हैं तो खुद आपको उसकी कीमत चुकानी होगी। जो जीतना चाहते हैं, वे देर नहीं लगाते। हार से घबराने की जरूरत भी नहीं है। ठहराव-सा आ सकता है। एक बार अगर आपने ठान लिया तो फिर कोई आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकता, असफलता भी नहीं। मोहम्मद गोरी को याद कीजिए, जिसे पृथ्वीराज चौहान ने 17 बार हराया, लेकिन अंतत: वह जीतने में कामयाब रहा। इस युद्ध में चौहान की हुई हार महज उनकी अपनी हार नहीं थी, बल्कि इस हार की वजह से भारत में सात सौ साल से भी ज्यादा समय तक मुस्लिम शासकों की सत्ता कायम रही।
इसी को कहते हैं मन में ठाने हुए को वास्तविकता में बदल देना जो न केवल आपके लिए, बल्कि आपके बाद आने वाली पीढ़ी के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है और आप उनके लिए नायक बन सकते हैं।
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